चैत्र महीने में ढोलरू परंपरा: मंगल गायन की अनूठी लोक संस्कृति

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चैत्र महीने में ढोलरू लोकगीतों के माध्यम से घर-घर तक मंगल का संदेश पहुंचाते हैं। हिमाचल प्रदेश और जम्मू क्षेत्र के कुछ इलाकों तक विस्तारित यह परंपरा इन दोनों राज्यों के आपसी सांस्कृतिक सम्बन्धों को भी सुदृढ़ बनाती है। लोकगीतों की सरल, सहज एवं सरस अभिव्यक्ति हेतु ढोलरू गायन को विशेष ख्याति प्राप्त रही है।

ढोलरू गायन: हिमाचल की समृद्ध संचार परंपरा

ढोलरू गायन हिमाचल प्रदेश की rich folk communication tradition का एक अभिन्न हिस्सा है। चैत्र महीने में गाए जाने वाले ये लोकगीत घर-घर मंगल का संदेश पहुंचाते हैं। यह परंपरा हिमाचल और जम्मू क्षेत्र में cultural bonds को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाती है।

लोकगीतों की सहज अभिव्यक्ति

ढोलरू गायन को इसकी simple, expressive और spiritual qualities के लिए विशेष ख्याति प्राप्त है। इन गीतों के माध्यम से religious values और cultural teachings समाज तक पहुंचाई जाती हैं।

समाज से जुड़ने का माध्यम

यह tradition जनसंचार और मनोरंजन का एक powerful tool रही है। ढोलरू गायन की मदद से social awareness और लोकगाथाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। जैसे पहला नां, बिजलो, द्रुबड़ी, मुरुहआ, नैणजा दई आदि के माध्यम से कई folk stories जीवंत बनी रहती हैं।

डुग्गर क्षेत्र में सांस्कृतिक समानताएं

डुग्गर क्षेत्र, जो कि Jammu-Kashmir, Punjab, और Himachal Pradesh (Kangra, Chamba, Kullu, Mandi) तक फैला हुआ है, यहां की भाषा, folk songs, traditional outfits और dances में कई समानताएं पाई जाती हैं।

परंपरा का ऐतिहासिक प्रमाण

2019 में DD News Himachal की report के अनुसार, चैत्र माह के दौरान Jammu-Kashmir से लोग Chamba पहुंचते हैं और ढोलरू गायन करते हैं। यह दर्शाता है कि राज्यों के विभाजन के बावजूद cultural roots intact बनी रही हैं।

धार्मिक और अनुष्ठानिक महत्व

Himachali folk expert Dr. Gautam Sharma Vyathit के अनुसार, ढोलरू गायन का एक विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक महत्व है। यह विशेष जाति के लोगों द्वारा गाया जाता है, और इसे गाने का धार्मिक अधिकार केवल उन्हीं के पास होता है।

ऋतु परिवर्तन से जुड़ी परंपरा

Prof. Suresh Sharma लिखते हैं कि ढोलरू गायन को seasonal change के साथ जोड़ा जाता है। इसलिए इसे Chait Mahina Songs, Chaiti Gathayein, या Maheene Da Naan भी कहा जाता है। इसे मंगलामुखी समुदाय के लोग गाते हैं, जिससे इसे sacred माना जाता है।

लोक संस्कृति का संरक्षण

कांगड़ा, चंबा, हमीरपुर और बिलासपुर जैसे जिलों में generations से यह tradition चली आ रही है। मान्यता है कि चैत्र महीने का नाम तब तक नहीं लिया जाता जब तक ढोलरू singers इसे गा न दें।

परंपरा के भविष्य को लेकर चिंता

वर्तमान में इस परंपरा को आगे बढ़ाने वालों की संख्या decline हो रही है। हिमाचली culture expert Dr. Yugal Kishore Dogra के अनुसार, younger generation अब इसमें कम interest ले रही है, और मांगने की practice को लेकर hesitation महसूस करती है।

ढोलरू परंपरा का संरक्षण जरूरी

समय के साथ लोगों की mentality और सोच बदल रही है। हालांकि, यह आवश्यक है कि हम इस cultural heritage को preserve करें ताकि यह भविष्य की generations तक जीवंत बनी रहे।

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